Sunday, 12 July 2015

जनहित मे जारी - 7

जनहित मे जारी - 7

      1980 प्रदर्शित फिल्म  "नाम" , महेश भट्ट द्वारा निर्देशित एक सुपरहिट फिल्म थी, स्क्रीन प्ले लिखा था  सलमान खान के पिता सलीम खानजीने , सलीम -जावेद जोडीने 27 सुपर हिट फिल्मे दी , अलग होने बाद सलीम खान द्वारा लिखी हुई  "नाम"  पहली फिल्म थी , कहानी कुछ इस प्रकार की थी , एक मां के दो बेटे , एक बेटा दुबई जाता है पैसे कमाने ने के लिये, वहा न चाहते हुए भी   ड्रग्ज के कारोबार   मे उलझ जाता है  और मारा जाता है ,  पिछे छोड जाता है बुढी मां, भाई और गर्भवती पत्नी !

     जिस गाने का जिक्र होगा उसे बिसवी सदी के  बेस्ट १०० सॉंग्ज की श्रेणी मे बी.बी.से. ने सामील किया है , संगीत दिया है लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने और गीत को लिखा  है आनंद बक्षीजीने !सच पूछिये तो  ये  गझल है , जिसे गाया है पंकज उधास ने ! गाने की सिच्युएशन ऐसी है के, फिल्म के नायक और नायिका अपने घरसे दूर दुबई मे है और दिल बेहलाने के लिये गाने की महफिल मे जाते है ! और वहा गायक पंकज उधास जी खुद ये गीत गाते हुये दिखायी और सुनाई देते है ! आईये लुफ्त उठाते है गझल का !

चिट्ठी आई है आई है
चिट्ठी आई है
चिट्ठी आई है वतन से
चिट्ठी आई है

बड़े दिनों के बाद,
हम बेवतनों को याद
वतन की मिट्टी आई है,
चिट्ठी आई है ...

तो हुआ यु है,  के वतन से और घरवालोसे दूर रेहनेवालो के नाम एक चिठ्ठी आई है , एक जमाना था जब लोग चिठ्ठीया लिखा करते थे और वो पहुचती भी   बडी देर से ! आज कल के इमेल , मोबाईल के जमाने मे चिठ्ठीयो का महत्व समझाना थोडा मुश्कील है , फिर भी कोशिश करता हुं !

 तो हुआ यु है  के वतन से, घरवालोसे दूर रेहनेवालो के नाम एक चिठ्ठी आई है ! बडे दिनो के बाद आई है , यहा   "बेवतन" शब्द का इस्तेमाल किया है , जिसका मतलब है , अपना वतन होते हुए भी वतन से दूर रहने वाले , एन.आर आई  केहलिजिये ! अजीब बात तो ये है  के,  ये चिठ्ठी एक बाप ने अपने बेटे को लिखी है, बेटा अकेला परदेस मे है  और बाप उसे घरका हाल बता रहा है , आम तौर पर ये "बाप" लोग,  जवान बेटोसे दुरिया बनाकर रहते है , दिलकी बात नही बताते , लेकिन यहा किस्सा और है ! खैर  लिखा क्या है चिठ्ठीमे ?

उपर मेरा नाम लिखा है,
अंदर ये पैग़ाम लिखा है
ओ परदेस को जाने वाले,
लौट के फिर ना आने वाले
सात समुंदर पार गया तू,
हमको ज़िंदा मार गया तू
खून के रिश्ते तोड़ गया तू,
आँख में आँसू छोड़ गया तू
कम खाते हैं कम सोते हैं,
बहुत ज़्यादा हम रोते हैं


एक पिता कह रहा है बेटेसे के  "हमको ज़िंदा मार गया तू" ! बहोत तकलीफ है इस बात मे , एक तो जिंदा होते हुए भी मरने का अहसास और इस अवस्था कारन कोई अपना, ! तो खाने और सोने से ज्यादा वक्त रोने मे जाना तो लाजमी है !  आगे देखिये घर का हाल कैसा है ,

सूनी हो गईं शहर की गलियाँ,
काँटे बन गईं बाग की कलियाँ
कहते हैं सावन के झूले,
भूल गया तू हम नहीं भूले

तेरे बिन जब आई दीवाली,
दीप नहीं दिल जले हैं खाली
तेरे बिन जब आई होली,
पिचकारी से छूटी गोली
पीपल सूना पनघट सूना
घर शमशान का बना नमूना
फसल कटी आई बैसाखी,
तेरा आना रह गया बाकी


पिता कह रहा है  के सबकुछ् तो   हो रहा है शहर मे , लेकिन हम लोग ही है जो जिंदगीका मजा नही ले पां रहे है ! "घर शमशान का बना नमूना" जैसी पंक्तीया दिल के दर्द को बडी सटीक तरिकेसे बया करती है ! होली मे पीचकारी से निकला रंग ऐसा कहर डालता है जैसे गोली चला दी हो किसीने, ऐसी पंक्तियोपे दाद देना भी दुभर और ना देना भी  !

लेकिन घर का ये हाल बेटे के जाने भरसे हुआ है ? या बात कुछ और है ! चलिये अंतिम अंतरा सुनते है

पहले जब तू खत लिखता था
काग़ज़ में चेहरा दिखता था
बूँद हुआ यह मेल भी अब तो,
ख़तम हुआ यह खेल भी अब तो
डोली में जब बैठी बहना,
रास्ता देख रहे थे नैना
मैं तो बाप हूँ मेरा क्या है,
तेरी माँ का हाल बुरा है
तेरी बीवी करती है सेवा,
सूरत से लगती है बेवा
तूने पैसा बहुत कमाया,
इस पैसे ने देश छुड़ाया
पंछी पिंजरा तोड़ के आजा,
देश पराया छोड़ के आजा
आजा उम्र बहुत है छोटी,
अपने घर में भी हैं रोटी,
चिट्ठी आई है

    पहले जब तू खत लिखता था, काग़ज़ में चेहरा दिखता था ! खत मे चेहरा दिखता है ? दिखता है जनाब , आवाज से दिलका हाल बया होता है और लब्जोमे चेहरा दिखता है , बस नजर चाहिये ! लेकिन बाद मे ये खत कम होते गये , बेटा ना बहन की शादी नाही आया , पत्नी को लेने नही आया , मां को देखने नही आया ! क्यू भई , क्या हुआ परदेस मे,  के अपने बेगाने हो गये ? "पंछी पिंजरा तोड़ के आजा" ये पंक्ती समस्या की तरफ इशारा करती है , समस्या है पैसे क्या मोह , इस पैसे के चक्कर मे आदमी कैदी बन जाता है , घर की रोटी काफी होती है लेकिन रास नही आती !

 क्यो चाहिये आदमी को पैसा ? क्या है इसमे ऐसा ? माना काफी सारे चीजे खरिदी जा सकती पैसे से ! लेकिन क्या जिंदगी से बडा है पैसा , अपनोके प्यार से बडा है पैसा , जिंदगी को जिये बिना पैसे के पिछे भागना क्या वाकई मे समजदारी है ? पता नही साहब , अपना अपना किस्सा है !

    अंतमे  एक बात जनहित मे जारी कर पुछ्ता  हुं ,क्या हालही मे आपको को ऐसा को खत तो नही आया ? अरे हा, आजकल खत या चिठ्ठी कोई लिखता है भला ! लेकिन कही ऐसा  तो नही के एकाद फोन , एस एम एस , व्हाटसं अप , इमेल के रूप मे आपके घर से कोई चिठ्ठी आई हो ? देख लीजीयेगा !

रणधीर पटवर्धन 

जनहित मे जारी 8

   जनहित मे जारी 8

  मेरा नाम जोकर 1970 में राज कपूर द्वारा निर्देशित और अभिनीत  फिल्म है।फ़िल्म एक जोकर की कहानी है । कहानी में दिखाया गया है कि एक जोकर ख़ुद के ग़मों और दुःखों को भुला, सब को खूब हँसाता है।आज जिस गीत का जिक्र होगा यह गीत लिखा है कवि/गीतकार "नीरज" ने [लेकिन अभी भी कई लोग यह समझते हैं कि यह गीत या तो शैलेन्द्र ने लिखा है या हसरत जयपुरी ने... ] और गाया है  मन्ना डेने [इसी गीत के लिये मन्ना डे को सर्वश्रेष्ठ गायक पुरस्कार से नवाज़ा गया था]  फ़िल्म का संगीत शंकर-जयकिशन ने दिया था।इस गीत मे सर्कस और असाल जिंदगीकी समानताये गीनाकार मनुष्य के जीवन को सर्कस बताया गया है , 

    सिच्युएशन ऐसी है के सर्कस का जोकर समझा रहा के असल मे आदमी क्यू और कैसे संभलकर रहना चाहिये !चलिये समझने की कोशिश करते है !


ऐ भाई 
जरा देख के चलो
आगे ही नहीं पीछे भी, 
दायें ही नहीं बाँये भी
ऊपर ही नहीं, नीचे भी.. 
ऐ भाई..
तू जहाँ आया है,
 वो तेराघर नहीं, 
गाँव नहीं, कूचा नहीं, 
रस्ता नहीं, 
दुनिया है..

समझे साहब , आप जिस जगह रहते हो उसे दुनिया केहते है , और आपको चौकन्ना रहना पडेगा ! क्यू चौकन्ना रहना पडेगा  हमे ? ये जानने के लिये आगे बढे और जानिये दुनिया की कुछ सच्चाइया 

और प्यारे दुनिया ये सरकस है 
और सरकस में..बडे को भी छोटे को भी, दुबले को भी मोटे को भी, खरे को भी खोटे भी
 रिंग मास्टर के कोडे़ पर...
कोडा़ जो भूख है, 
कोडा़ जो पैसा है, 
कोडा़ जो किस्मत है,
तरह-तरह नाच के 
दिखाना यहाँ पडता है,
बार-बार रोना और
 गाना यहाँ पडता है,
हीरो से जोकर 
बन जाना पडता है...
ऐ भाई...

ऊपर से नीचे को, 
नीचे से ऊपर को 
आना-जाना पडता है..

तो समझे आप, ये दुनिया  सर्कस है और हम जो भी करते है वो "कोडे " के डर की वजह से करते है , जीवन मे उपर और नीचे जाना , हिरो और जोकर बनना, नाचना , गाना, सब कोडे की डर की वजह से  ! और कोडा क्या है , कोडा पैसा है , कोडा भूक है , कोडा किस्मत है ! मुझे लगता है इसको अगर ठीक से समझे ,तो इसका एक और मतलब भी निकलता है,  के अगर कोडे का डर नही होता,तो हम अपनी मर्जी के मालिक होते ! याने सत्ता , पैसा इनके लोभ मे न फसे तो मुन्कीन है के जिंदगीसे डर निकल जायेगा, लेकिन क्या हम कर पायेंगे ऐसा ? खैर अगला अंतरा देखिये जिसमे सर्कस के और जानवर और मनुष्य का भेद दिखाया है ! ...
क्या है करिश्मा,
 कैसा खिलवाड है,
जानवर आदमी से 
ज्यादा वफ़ादार है,
खाता है कोडा भी, 
रहता है भूखा भी
फ़िर भी वो मालिक पर
 करता नहीं वार है
और इन्सान 
माल जिसका खाता है
प्यार जिससे पाता है
गीत जिसके गाता है
उसके ही सीने में 
भोंकता कटार है

     अजीब सी सच्चाई है इस अंतरे मे , अचरज की बात ये है के ऐसा हर इन्सान को लगता है  के ज्यादातर इन्सान अहसान फरामोश होते है , अगर हर किसिको लगता है तो इसका मतलब ,मै और आप भी तो सामील है इसमे ! क्यू इन्सान माल जिसका खाता है,प्यार जिससे पाता है,गीत जिसके गाता है,उसके ही सीने में ,भोंकता कटार है! इसका एक जवाब ये भी हो सकता है के , जो माल या प्यार देता है वह शायद दुसरे हात से दुगने दाम वसुल भी करता होगा ! तो अगर ये सच है, तो हमे या तो ऐसा नही करना चाहिये या फिर सिने मे कटार लेने की तय्यारी करनी चाहिये ! अगले अंतरे मे शायर बताता है क्यू इन्सान को हार से डरना नही चाहिये , चलिये जानते है

गिरने से डरता है क्यों,
 मरने से डरता है क्यों
ठोकर तू जब तक ना खायेगा
पास किसी गम को न 
जब तक बुलायेगा
जिन्दगी है राज क्या, 
नहीं जान पायेगा
रोता हुआ आया है, 
रोता चला जायेगा..
ऐ भाई...

ठोकर तू जब तक ना खायेगा, जिन्दगी है राज क्या, नहीं जान पायेगा, याने शायर का मानना है जिंदगी मे मिली हार आदमी को ज्यादा शिक्षित करती है ! वाकई ? और ये सही है तो हम स्ब जीत के लिये इतने उतावले व हार से इतना डरते क्यू है ? और जिंदगी का ऐसा कौनसा राज है जो बस हार ही हमको सिखा सकती है ? मुझे लगता है के गीतकार ये समझाने की कोशिश कर रहा है के हार जिंदगीका हिस्सा है और उसे हमेसिखाकर  उभारना चाहिये नाके मायूस होना चाहिये ! अब हम बढ रहे है अंतिम अंतरे की तरफ , जिसमे ये बताया गया है के अंत मे राजा हो या रंक , अमीर हो या गरीब सबका खेल एक दिन खतम होना है ! आईये जानते है सर्कस और इन्सान के जीवन की एक और समानता 

हाँ बाबू..

ये सर्कस  है..
और ये सर्कस है 
शो तीन घंटे का..
पहला घंटा बचपन है,
दूसरा जवानी है,
तीसरा बुढापा..
और इसके बाद
माँ नहीं, बाप नहीं, 
बेटा नहीं, बेटी नहीं,
 तू नहीं, मैं नहीं, 
ये नहीं, वो नहीं
कुछ भी नहीं रहता है
रहता है जो कुछ बस 
खाली-खाली कुर्सियाँ हैं, 
खाली-खाली तम्बू है
खाली-खाली डेरा है,
बिना चिडिया का बसेरा है,
ना तेरा है ना मेरा है...

चलिये मान लिया खाली-खाली कुर्सियाँ हैं, खाली-खाली तम्बू हैखाली-खाली डेरा है,बिना चिडिया का बसेरा है, ना तेरा है ना मेरा है !  लेकिन फिर ये खाली तंबू किसका है , उनका जो ये "शो" देखने आते है ? लेकिन वो भी तो किसी और सर्कस मे अपना खेल दिखाते है ? तो ये खाली तंबू किसका है  कही ऐसा तो नही के सर्कस अपने आप मे एक रींग मास्टर हो ? प्रेक्षक भी हो ?अगर ऐसा है तो फिर  ये "शो " किया क्यू जा रहा है ? पूछे किससे?इस गीत के सारे रचनाकार जा चुके है ! तो फिर एक बार कुछ आधे अधुरे सवालो के साथ आप को छोडकर मै आपकी इजाजत लेता हुं , मिलते है अगले हप्ते , तब तक जिंदगी नामक सर्कस मे भाग लीजीयेगा और औरोके खेल का मजा लीजीयेगा , नमस्कार 

रणधीर पटवर्धन
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