जनहित मे जारी 8
मेरा नाम जोकर 1970 में राज कपूर द्वारा निर्देशित और अभिनीत फिल्म है।फ़िल्म एक जोकर की कहानी है । कहानी में दिखाया गया है कि एक जोकर ख़ुद के ग़मों और दुःखों को भुला, सब को खूब हँसाता है।आज जिस गीत का जिक्र होगा यह गीत लिखा है कवि/गीतकार "नीरज" ने [लेकिन अभी भी कई लोग यह समझते हैं कि यह गीत या तो शैलेन्द्र ने लिखा है या हसरत जयपुरी ने... ] और गाया है मन्ना डेने [इसी गीत के लिये मन्ना डे को सर्वश्रेष्ठ गायक पुरस्कार से नवाज़ा गया था] फ़िल्म का संगीत शंकर-जयकिशन ने दिया था।इस गीत मे सर्कस और असाल जिंदगीकी समानताये गीनाकार मनुष्य के जीवन को सर्कस बताया गया है ,
सिच्युएशन ऐसी है के सर्कस का जोकर समझा रहा के असल मे आदमी क्यू और कैसे संभलकर रहना चाहिये !चलिये समझने की कोशिश करते है !
ऐ भाई
जरा देख के चलो
आगे ही नहीं पीछे भी,
दायें ही नहीं बाँये भी
ऊपर ही नहीं, नीचे भी..
ऐ भाई..
तू जहाँ आया है,
वो तेराघर नहीं,
गाँव नहीं, कूचा नहीं,
रस्ता नहीं,
दुनिया है..
समझे साहब , आप जिस जगह रहते हो उसे दुनिया केहते है , और आपको चौकन्ना रहना पडेगा ! क्यू चौकन्ना रहना पडेगा हमे ? ये जानने के लिये आगे बढे और जानिये दुनिया की कुछ सच्चाइया
और प्यारे दुनिया ये सरकस है
और सरकस में..बडे को भी छोटे को भी, दुबले को भी मोटे को भी, खरे को भी खोटे भी
रिंग मास्टर के कोडे़ पर...
कोडा़ जो भूख है,
कोडा़ जो पैसा है,
कोडा़ जो किस्मत है,
तरह-तरह नाच के
दिखाना यहाँ पडता है,
बार-बार रोना और
गाना यहाँ पडता है,
हीरो से जोकर
बन जाना पडता है...
ऐ भाई...
रिंग मास्टर के कोडे़ पर...
कोडा़ जो भूख है,
कोडा़ जो पैसा है,
कोडा़ जो किस्मत है,
तरह-तरह नाच के
दिखाना यहाँ पडता है,
बार-बार रोना और
गाना यहाँ पडता है,
हीरो से जोकर
बन जाना पडता है...
ऐ भाई...
ऊपर से नीचे को,
नीचे से ऊपर को
आना-जाना पडता है..
तो समझे आप, ये दुनिया सर्कस है और हम जो भी करते है वो "कोडे " के डर की वजह से करते है , जीवन मे उपर और नीचे जाना , हिरो और जोकर बनना, नाचना , गाना, सब कोडे की डर की वजह से ! और कोडा क्या है , कोडा पैसा है , कोडा भूक है , कोडा किस्मत है ! मुझे लगता है इसको अगर ठीक से समझे ,तो इसका एक और मतलब भी निकलता है, के अगर कोडे का डर नही होता,तो हम अपनी मर्जी के मालिक होते ! याने सत्ता , पैसा इनके लोभ मे न फसे तो मुन्कीन है के जिंदगीसे डर निकल जायेगा, लेकिन क्या हम कर पायेंगे ऐसा ? खैर अगला अंतरा देखिये जिसमे सर्कस के और जानवर और मनुष्य का भेद दिखाया है ! ...
क्या है करिश्मा,
कैसा खिलवाड है,
जानवर आदमी से
ज्यादा वफ़ादार है,
खाता है कोडा भी,
रहता है भूखा भी
फ़िर भी वो मालिक पर
करता नहीं वार है
और इन्सान
माल जिसका खाता है
प्यार जिससे पाता है
गीत जिसके गाता है
उसके ही सीने में
भोंकता कटार है
अजीब सी सच्चाई है इस अंतरे मे , अचरज की बात ये है के ऐसा हर इन्सान को लगता है के ज्यादातर इन्सान अहसान फरामोश होते है , अगर हर किसिको लगता है तो इसका मतलब ,मै और आप भी तो सामील है इसमे ! क्यू इन्सान माल जिसका खाता है,प्यार जिससे पाता है,गीत जिसके गाता है,उसके ही सीने में ,भोंकता कटार है! इसका एक जवाब ये भी हो सकता है के , जो माल या प्यार देता है वह शायद दुसरे हात से दुगने दाम वसुल भी करता होगा ! तो अगर ये सच है, तो हमे या तो ऐसा नही करना चाहिये या फिर सिने मे कटार लेने की तय्यारी करनी चाहिये ! अगले अंतरे मे शायर बताता है क्यू इन्सान को हार से डरना नही चाहिये , चलिये जानते है
गिरने से डरता है क्यों,
मरने से डरता है क्यों
ठोकर तू जब तक ना खायेगा
पास किसी गम को न
जब तक बुलायेगा
जिन्दगी है राज क्या,
नहीं जान पायेगा
रोता हुआ आया है,
रोता चला जायेगा..
ऐ भाई...
मरने से डरता है क्यों
ठोकर तू जब तक ना खायेगा
पास किसी गम को न
जब तक बुलायेगा
जिन्दगी है राज क्या,
नहीं जान पायेगा
रोता हुआ आया है,
रोता चला जायेगा..
ऐ भाई...
ठोकर तू जब तक ना खायेगा, जिन्दगी है राज क्या, नहीं जान पायेगा, याने शायर का मानना है जिंदगी मे मिली हार आदमी को ज्यादा शिक्षित करती है ! वाकई ? और ये सही है तो हम स्ब जीत के लिये इतने उतावले व हार से इतना डरते क्यू है ? और जिंदगी का ऐसा कौनसा राज है जो बस हार ही हमको सिखा सकती है ? मुझे लगता है के गीतकार ये समझाने की कोशिश कर रहा है के हार जिंदगीका हिस्सा है और उसे हमेसिखाकर उभारना चाहिये नाके मायूस होना चाहिये ! अब हम बढ रहे है अंतिम अंतरे की तरफ , जिसमे ये बताया गया है के अंत मे राजा हो या रंक , अमीर हो या गरीब सबका खेल एक दिन खतम होना है ! आईये जानते है सर्कस और इन्सान के जीवन की एक और समानता
हाँ बाबू..
ये सर्कस है..
और ये सर्कस है
शो तीन घंटे का..
पहला घंटा बचपन है,
दूसरा जवानी है,
तीसरा बुढापा..
और इसके बाद
माँ नहीं, बाप नहीं,
बेटा नहीं, बेटी नहीं,
तू नहीं, मैं नहीं,
ये नहीं, वो नहीं
कुछ भी नहीं रहता है
रहता है जो कुछ बस
खाली-खाली कुर्सियाँ हैं,
खाली-खाली तम्बू है
खाली-खाली डेरा है,
बिना चिडिया का बसेरा है,
ना तेरा है ना मेरा है...
और ये सर्कस है
शो तीन घंटे का..
पहला घंटा बचपन है,
दूसरा जवानी है,
तीसरा बुढापा..
और इसके बाद
माँ नहीं, बाप नहीं,
बेटा नहीं, बेटी नहीं,
तू नहीं, मैं नहीं,
ये नहीं, वो नहीं
कुछ भी नहीं रहता है
रहता है जो कुछ बस
खाली-खाली कुर्सियाँ हैं,
खाली-खाली तम्बू है
खाली-खाली डेरा है,
बिना चिडिया का बसेरा है,
ना तेरा है ना मेरा है...
चलिये मान लिया खाली-खाली कुर्सियाँ हैं, खाली-खाली तम्बू हैखाली-खाली डेरा है,बिना चिडिया का बसेरा है, ना तेरा है ना मेरा है ! लेकिन फिर ये खाली तंबू किसका है , उनका जो ये "शो" देखने आते है ? लेकिन वो भी तो किसी और सर्कस मे अपना खेल दिखाते है ? तो ये खाली तंबू किसका है कही ऐसा तो नही के सर्कस अपने आप मे एक रींग मास्टर हो ? प्रेक्षक भी हो ?अगर ऐसा है तो फिर ये "शो " किया क्यू जा रहा है ? पूछे किससे?इस गीत के सारे रचनाकार जा चुके है ! तो फिर एक बार कुछ आधे अधुरे सवालो के साथ आप को छोडकर मै आपकी इजाजत लेता हुं , मिलते है अगले हप्ते , तब तक जिंदगी नामक सर्कस मे भाग लीजीयेगा और औरोके खेल का मजा लीजीयेगा , नमस्कार
रणधीर पटवर्धन
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