Saturday, 30 May 2015

जनहित मे जारी 2

   जनहित मे जारी 
  सन १९८१ मे प्रदर्शित फिल्म "एक दुजे के लिये फिल्म" काफी मामले मे अलग थी, एक तो इसमे दक्षिण और उत्तर भारतीय रिती रीवाजो का संघर्ष एवं मिलाप दिखाया गया है, दुसरा इस फिल्म का अंत दुखद है और फिर भी ये फिल्म हिट हुई , तिसरी इसके निर्देशक हिंदी भाषिक नही थे, फिर भी इस फिल्म के गाने का जो शायराना अंदाज है वो काफी अलग और उमदा है ! और  इस फिल्म के संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने जो राग हंसध्वनी का इस्तेमाल किया है और लताजीने उसको  जो गाया है , उसकी तो क्या कहने, बस एक रुहानी एहसास और कुछ नही
    इसमे एक  गाना है "सोला बरस की बाली उम्र को सलाम"! इस गानेकी सिच्युएशन ऐसी है के फिल्म की नायिका प्यार कर बैठी है और वो भी पहली बार !    उसको अब बस  और कुछ नही सुझ रहा , सारी दुनिया रंगीन है उसकी और बस इस एहसास के लीये, उसके अनुसार जो भी चीजे जिम्मेदार है वह उनका शुक्रगुजार कर रही है ! चलिये  फिल्म के गाने कि तरफ मुडते है,
 इस गाने के सुरु होने से पहले अनुप जलोटा जी के स्वर मे एक शेर कुछ इस तरह आता है 
कोशिश कर के देख ले, दरिया सारे, नदियाँ सारी
दिल की लगी नहीं बुझती, बुझती हर चिंगारी
बस मेसेज साफ है सर , चाहे जो करलो ये ईश्कजादे सब कुछ लांघकर निकल जायेंगे ! और इस शेर के बाद लताजी के अमृतस्वर मे गाने का  मुखडा  सुनाई देता है ,  
सोला बरस की बाली उम्र को सलाम
ऐ प्यार तेरी, पहली नजर को सलाम
इस का मतलब ये है के , लडकी के जिंदगी मे जवानी दस्तक दे चुकी है और जिसने दरवाजा खोला है उसने  नासिर्फ खिलते यौवन को  महसूस कीया  है बलकी  वह प्यार भी कर बैठी है ! आगे देखिये 
दुनिया में सब से पहले, जिस ने ये दिल दिया
दुनिया के सब से पहले, दिलबर को सलाम
दिलसे निकलने वाले, रस्ते का शुक्रिया
दिल तक पहुचनी वाली डगर को सलाम
लडकी का अंदाजे बयां देखिये,  वह उस हर चीज की शुक्रगुजार है जिसने प्यार को इजाद किया है क्युके आज जो खुशी , जो उमंग वह महसूस कर रही है वह सिर्फ प्यार नामक चिडिया के अस्तित्व के वजहसे है ! अगला अंतरा तो काफी अलग विचार रखता है ,

जिस्मे जवान होकर, बदनाम हम हुए
उस शहर, उस गली, उस घर को सलाम
जिसने हमे मिलाया, जिसने जुदा किया
उस वक्त, उस घड़ी, उस  डगर को सलाम
"जिस्मे जवान होकर, बदनाम हम हुए" , याने लडकी का मानना ये है, के ये सारा कसूर जिस्मो का है और वह मुफ्त मे बदनाम है ! लेकिन फिर भी वह उस क्षण को, उस मोड को धन्यवाद देना नही भुलती  ! आगे आखरी अंतरे  को ध्यान से    पढिये   
मिलते रहे यहाँ हम, ये है यहाँ लिखा
इस लिखावट की जेरो ज़बर को सलाम
साहिल की रेत पर यूँ लहरा उठा ये दिल
सागर में उठने वाली हर लहर को सलाम
इन मस्त गहरी गहरी, आँखों की झील में
जिसने हमे डूबोया, उस भँवर को सलाम
घूंघट को तोड़ कर जो सर से सरक गयी
ऐसी निगोड़ी धानी चुनर को सलाम
उल्फत के दुश्मनों ने कोशिश हजार की
फिर भी नहीं झूकी जो, उस नजर को सलाम
सही तो है  , अगर निगोड़ी धानी चुनर, नहीं झूकी वो नजर,आँखों का भँवर ये सब परंपरा को तोडने की गलती नही करते,  तो वह इस प्यार के एहसास ये मायूस ही रहती ! 
    ये गीत, औरत किस    तरह प्यार को महत्वपूर्ण   उपलब्धी मानती है और उसके जीवन मे इसका स्थान क्या है , इसको   दर्शाता  है , वह जानती है के बगावत के अंजाम उसे भूगतने पडेंगे, लेकिन फिरभी उन प्यार के चार  लम्हे को वह  जीना चाहती है ! अजीब बात ये है के इस गीत को एक मर्द ने लिखा है लेकिन फिर भी औरत के जज्बातोंको उन्होने सटीकता से बांधा है !   
  मैने प्यार के एहसास के प्रति इतने सही तरीके कहने वाले कम ही गाने सुने है !  और उसमे भी  औरत के दिलकी बात इतनी बेखौफ अंदाज मे कहनेवाले गाने तो औरभी कम सुने है ! याद राखिये मर्द को ज्यादा समझीये , प्यार थोडा कम भी करेंगी तो भी चलेगा  लेकिन औरत को ज्यादा से ज्यादा प्यार किजीये,परसमझने की कोशिश बिलकुल भी न किजीये " क्युके आदमी के जिंदगी मे प्यार होता है लेकिन औरत के लिये प्यार ही जिंदगी है !  
धन्यवाद,  मिलते है अगली बार कुछ् और बातोंको   जनहित मे जारी करने के लिये !
रणधीर पटवर्धन 


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