जनहित मे जारी
सत्या फिल्म रिलीज हुई 1998 मे, राम गोपाल वर्मा निर्देशक है , संगीत विशाल भारद्वाज का है , गीत लिखे है गुलजारजीने , जिस गीत का आज जिक्र होगा उसको गाया है आशा भोंसले और सुरेश वाडेकरजीने , सत्या एक अजीब किसम की फिल्म है, इस फिल्मके 99% किरदार गलत काम करते है , उनको ये पता है के जो वो काम कर रहे है वो हर लिहाज से गलत है , लेकिन उसमेसे किसिके मन मे जराभी अपराधभाव नही है और नाही ये दिखाया गया है के उसमेसे किसीके पास ऐसा करने कोई ठोस वजह है !
खैर चलिये गीत तरफ मुडते है , हम सब जानते है के व्यक्ती जब अपनी भावनावोंको बयां करता है, तो वह वही लब्ज इस्तेमाल करता है, जो लब्ज वह और उसकी दुनिया के लोग आमतौरपर बात करते वक्त इस्तेमाल करते है ! लेकिन फिल्मो ऐसा काफी कम देखने को मिला है के, किरदार जिस माहौल मे रचा ढला और पला बढा हो गीत के बोल भी वैसेही ही हो ! लेकिन इस फिल्म के एक गीत मे किरदारोंको अपनी जबान मे अपनी भावनावोंको बयां करता हुआ दिखाया है !
सिच्युएशन ऐसी है के एक शादी मे माफिया गिरोह के लोग अपने घरवालोके साथ सामील हुए है ! गिरोह का मुखिया और उसकी बीवी एक दुसरे को छेडते हुए सबके साथ नाच गा रहे है ! अब गिरोह का मुखिया और उसकी बीवी शहर मे तो जरूर पले बढे है लेकिन कोई ज्यादा पढे लिखे तो है नही, तो देखिये कैसे वो एक दुसरे को यह वर्णन कर बता रहे है के उनके सपनोका राजकुमार या राजकुमारी कैसी है !
सपने में मिलती है
ओ कुड़ी मेरी, सपने में मिलती है
सारा दिन घुँघटे में बंद गुड़िया सी
अँखियों में घुलती है
सपने में मिलता है
ओ मुण्डा मेरा, सपने में मिलता है
सारा दिन सड़कों पे खाली रिक्शे सा
पीछे-पीछे चलता है
मैने इस गानेसे पेहले कभीभी अपने पिछे पिछे भागने वाले अपने प्रियतम प्यारे को "खाली रिक्शे" की उपमा से अलंकृत किया हुआ नही सुना ! आज भी जब कभी एकाद खाली रिक्शा जब मेरे या किसी और के इर्द गिर्द घुमता हुआ पाता हुं तो मुझे ये गीतपंक्तीया जरूर याद आती है ! अब आगे बढते है , अब देखिये अपनी प्रियतमा को किस नजर से देखता है इस गीत का नायक
कोरी है, करारी है
भून के उतारी है
कभी-कभी मिलती है
ओ कुड़ी मेरी, सपने में मिलती है
यहा गीत का नायक नायिका को सीधा सीधा "भुट्टा" कह रहा है , ये कमाल तो बस गुलजारजी ही कर सकते है , चलिये अब सुनते है के नायक के शक्लो-सुरत का बखान नायिका किस तरह कर रही है
ऊँचा लम्बा कद है
चौड़ा भी तो हद है
दूर से दिखता है
ओ मुण्डा मेरा...
अरे देखने में तगड़ा है
जंगल से पकड़ा है
सींग दिखाता हैसपने में मिलता है...
हद हो गयी मायबाप , क्या दुरसे दिखना भी किसीके व्यक्तीत्वं के गुणोमे सामील हो सकता है ?क्या कोई सरे आम अपने प्रियतम को जंगल से पकडा हुआ तगडा जानवर बुला सकती है ? लेकिन यहा वो कह भी रही है और ये सुनकर उसके शौहर साब बडे खुश भी हो रहे है ! आगे देखिये नायक कहता है के उसकी प्रियतमा तो
पाजी है, शरीर है
घूमती लकीर है
चकरा के चलती है
सपने में मिलती है...
लो करलो बात , ये सुनकर वह कहती है के
अरे कच्चे पक्के बेरों से
चोरी के शेरों से
दिल बहलाता है
रे मुण्डा मेरा. सपने में मिलता है...
ध्यान दिजीयेगा प्रियतमा को ये पता है के, वह जो शेर उसको अपने कहकर सुनाता है, वह असल मे किसी और के है लेकिन उसे फिर भी वो पसंद है ! अब देखिये वह उसकी सुंदरता को कैसे समझा रहा है
हाय गोरा चिट्टा रंग है
चाँद का पलंग है
चाँदनी में धुलती है
हो कुड़ी मेरी...
दूध का उबाल है
हँसी तो कमाल है
मोतियों में तुलती हैसपने में मिलती है...
क्या आपने कभी अपनी मेहबुबा को चाँद का पलंग, दूध का उबाल कहने बारे मे सोचा भी है ? लेकिन यहा ये जनाब कह भी रहे है और उनकी मेहबुबा को ये सुनकर बडा मजा भी आ रहा है , साहब ऐसा इसलिये हो रहा है क्योकि जिन उदाहरणोका वह इस्तेमाल कर रहा है , उन सभी को यह भली भाती समझती है और इसलिये इन उदाहरणोके पिछे छुपे भावनावोंको भी वह समज रही है !
अंत मे वह कहती है
नीम शरीफ़ों के
एंवें लतीफ़ों के क़िस्से सुनाता है
सपने में मिलता है...
यांनी उसका मेहबुब उसे इसलिये पसंद है क्योकि वह उसको दुनिया किस्से और लतीफे सुनाता है , एक राज की बात मै बता दु , जो इन्सान अपने पत्नी या मेहबुबा को हसा सकता है उसे औरते काफी पसंद करती है !
तो हम सब जानते है के प्रेम की कोई एक भाषा नही होती , लेकिन जनाब ये बहोत जरुरी है के जिसको हम अपने दिल का राज बता रहे हो, उसे हमारी भाषा समझमे तो आनीही चाहिये ! बस इस बात का खयाल रखीयेगा के और देखिये आपका फायदा ही होगा ! भई इसीलिये तो हमने जनहित मे जारी किया है ! तो मिलते है अगली बार , धन्यवाद !
सत्या फिल्म रिलीज हुई 1998 मे, राम गोपाल वर्मा निर्देशक है , संगीत विशाल भारद्वाज का है , गीत लिखे है गुलजारजीने , जिस गीत का आज जिक्र होगा उसको गाया है आशा भोंसले और सुरेश वाडेकरजीने , सत्या एक अजीब किसम की फिल्म है, इस फिल्मके 99% किरदार गलत काम करते है , उनको ये पता है के जो वो काम कर रहे है वो हर लिहाज से गलत है , लेकिन उसमेसे किसिके मन मे जराभी अपराधभाव नही है और नाही ये दिखाया गया है के उसमेसे किसीके पास ऐसा करने कोई ठोस वजह है !
खैर चलिये गीत तरफ मुडते है , हम सब जानते है के व्यक्ती जब अपनी भावनावोंको बयां करता है, तो वह वही लब्ज इस्तेमाल करता है, जो लब्ज वह और उसकी दुनिया के लोग आमतौरपर बात करते वक्त इस्तेमाल करते है ! लेकिन फिल्मो ऐसा काफी कम देखने को मिला है के, किरदार जिस माहौल मे रचा ढला और पला बढा हो गीत के बोल भी वैसेही ही हो ! लेकिन इस फिल्म के एक गीत मे किरदारोंको अपनी जबान मे अपनी भावनावोंको बयां करता हुआ दिखाया है !
सिच्युएशन ऐसी है के एक शादी मे माफिया गिरोह के लोग अपने घरवालोके साथ सामील हुए है ! गिरोह का मुखिया और उसकी बीवी एक दुसरे को छेडते हुए सबके साथ नाच गा रहे है ! अब गिरोह का मुखिया और उसकी बीवी शहर मे तो जरूर पले बढे है लेकिन कोई ज्यादा पढे लिखे तो है नही, तो देखिये कैसे वो एक दुसरे को यह वर्णन कर बता रहे है के उनके सपनोका राजकुमार या राजकुमारी कैसी है !
सपने में मिलती है
ओ कुड़ी मेरी, सपने में मिलती है
सारा दिन घुँघटे में बंद गुड़िया सी
अँखियों में घुलती है
सपने में मिलता है
ओ मुण्डा मेरा, सपने में मिलता है
सारा दिन सड़कों पे खाली रिक्शे सा
पीछे-पीछे चलता है
मैने इस गानेसे पेहले कभीभी अपने पिछे पिछे भागने वाले अपने प्रियतम प्यारे को "खाली रिक्शे" की उपमा से अलंकृत किया हुआ नही सुना ! आज भी जब कभी एकाद खाली रिक्शा जब मेरे या किसी और के इर्द गिर्द घुमता हुआ पाता हुं तो मुझे ये गीतपंक्तीया जरूर याद आती है ! अब आगे बढते है , अब देखिये अपनी प्रियतमा को किस नजर से देखता है इस गीत का नायक
कोरी है, करारी है
भून के उतारी है
कभी-कभी मिलती है
ओ कुड़ी मेरी, सपने में मिलती है
यहा गीत का नायक नायिका को सीधा सीधा "भुट्टा" कह रहा है , ये कमाल तो बस गुलजारजी ही कर सकते है , चलिये अब सुनते है के नायक के शक्लो-सुरत का बखान नायिका किस तरह कर रही है
ऊँचा लम्बा कद है
चौड़ा भी तो हद है
दूर से दिखता है
ओ मुण्डा मेरा...
अरे देखने में तगड़ा है
जंगल से पकड़ा है
सींग दिखाता हैसपने में मिलता है...
हद हो गयी मायबाप , क्या दुरसे दिखना भी किसीके व्यक्तीत्वं के गुणोमे सामील हो सकता है ?क्या कोई सरे आम अपने प्रियतम को जंगल से पकडा हुआ तगडा जानवर बुला सकती है ? लेकिन यहा वो कह भी रही है और ये सुनकर उसके शौहर साब बडे खुश भी हो रहे है ! आगे देखिये नायक कहता है के उसकी प्रियतमा तो
पाजी है, शरीर है
घूमती लकीर है
चकरा के चलती है
सपने में मिलती है...
लो करलो बात , ये सुनकर वह कहती है के
अरे कच्चे पक्के बेरों से
चोरी के शेरों से
दिल बहलाता है
रे मुण्डा मेरा. सपने में मिलता है...
ध्यान दिजीयेगा प्रियतमा को ये पता है के, वह जो शेर उसको अपने कहकर सुनाता है, वह असल मे किसी और के है लेकिन उसे फिर भी वो पसंद है ! अब देखिये वह उसकी सुंदरता को कैसे समझा रहा है
चाँद का पलंग है
चाँदनी में धुलती है
हो कुड़ी मेरी...
दूध का उबाल है
हँसी तो कमाल है
मोतियों में तुलती हैसपने में मिलती है...
क्या आपने कभी अपनी मेहबुबा को चाँद का पलंग, दूध का उबाल कहने बारे मे सोचा भी है ? लेकिन यहा ये जनाब कह भी रहे है और उनकी मेहबुबा को ये सुनकर बडा मजा भी आ रहा है , साहब ऐसा इसलिये हो रहा है क्योकि जिन उदाहरणोका वह इस्तेमाल कर रहा है , उन सभी को यह भली भाती समझती है और इसलिये इन उदाहरणोके पिछे छुपे भावनावोंको भी वह समज रही है !
अंत मे वह कहती है
नीम शरीफ़ों के
एंवें लतीफ़ों के क़िस्से सुनाता है
सपने में मिलता है...
यांनी उसका मेहबुब उसे इसलिये पसंद है क्योकि वह उसको दुनिया किस्से और लतीफे सुनाता है , एक राज की बात मै बता दु , जो इन्सान अपने पत्नी या मेहबुबा को हसा सकता है उसे औरते काफी पसंद करती है !
तो हम सब जानते है के प्रेम की कोई एक भाषा नही होती , लेकिन जनाब ये बहोत जरुरी है के जिसको हम अपने दिल का राज बता रहे हो, उसे हमारी भाषा समझमे तो आनीही चाहिये ! बस इस बात का खयाल रखीयेगा के और देखिये आपका फायदा ही होगा ! भई इसीलिये तो हमने जनहित मे जारी किया है ! तो मिलते है अगली बार , धन्यवाद !
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