जनहित मे जारी - ६
परदेस से याने के अलग मुल्योंके देस से एक संगीतकार और गायक भारत मे संगीत सिखने गुरु के घर रहता है , उसके बेटी और वह प्यार कर बैठते है, गुरुदक्षिणा के ऐवज मे उसे प्यार की कुर्बानी देनी पडती है,गुरु की बेटी कही और बिहाई जाती है , शादीके बाद उसका पती उसे पिया से मिलाने की ठान लेता है , अंत मे संस्कार जीतते है, प्रेम हार जाता है !
अब तक बताई गई कहानी है 1999 मे प्रदर्शित और संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्म हम दिल दे चुके सनम की !यह फिल्म नसिरुद्दीन शाह , अनिल कपूर और पद्मिनी कोल्हापुरे द्वारा अभिनीत फिल्म "वो सात दिन " से काफी प्रभावीत है और वो सात दिन प्रभावीत है काफी सारे दक्षिण भारतीय फिल्मोसे ! हम दिल दे चुके सनम के संगीतकार है इस्माईल दरबार , गीतकार है मेहबुब और जिस गाने का आज जिक्र होगा उसे गाया है गायक "के के" ने !
यह गाणं फिल्म के दौरान उस वक्त सुनाई देता है जब गुरुदक्षिणा के ऐवज मे अपने प्यार की कुर्बानी दे कर फिल्म का नायक गुरु का घर छोड अपने देस वापिस जा रहा है , उसकी प्रेमिका घर के छत से देखते हुये भी, न चाहते हुये भी उसे जाने दे रही है ! गाना अपने मुखडे तक एक शेर के बाद पहूचता है , शेर कुछ् ऐसा है
बेजान दिल को तेरे
इश्क ने जिंदा किया
फिर तेरे इश्क ने ही
इस दिल को तबाह किया
मतलब बस इश्क ही बनाता है और इश्क ही तबाह कर देता है ! चलिये मुखडे की तरफ बढते है !
तड़प तड़प के
इस दिल से
आह निकलती रही
मुझको सजा दी प्यार की
ऐसा क्या गुनाह किया
तो लुट गए
हाँ लुट गए
तो लुट गए
हम तेरी मोहब्बत में
ठीक ध्यान दिजीयेगा नायक पुछ् रहा है, के भई प्यार ही तो किया था , ऐसा क्या गुनाह किया ? के लुट गये यांनी तबाह और बरबाद हो गये ! इसका मतलब, वह इस बात से अंजान है के हालाकी प्यार करना जुर्म नही है मगर " किससे प्यार हुआ है, किंस हालात मे प्यार किया है ? प्रेमियोंकी पार्श्वभूमी क्या है ? जैसे सवालो के जवाब प्यार को गुनाह बना देते है ! और गुनाह की सजा तो भुगतनी पडती है ! सारी अमर प्रेम कहानिया इस बात की गवाह है ! खैर चलिये अंतरे की तरफ बढते है
अजब है इश्क यारा
पल दो पल की खुशियाँ
गम के खजाने मिलते हैं
मिलती है तन्हाईयाँ
कभी आंसूं कभी आहें
कभी शिकवे कभी नालें
तेरा चेहरा नज़र आये
तेरा चेहरा नज़र आये
मुझे दिन के उजालों में
तेरी यादें तड़पाएं
तेरी यादें तड़पाएं
रातों के अंधेरों में
तेरा चेहरा नज़र आये
मचल-मचल के इस दिल से
आह निकलती रही
मुझको सजा दी प्यार की
ऐसा क्या गुनाह किया.
अब दुविधा देखिये इस बंदे की , वह असफल प्रेम की आग मे झुलस रहा है , उसका जीना किसी सजा से कम नही है ! और तो और, उसे ये समजमे नही आ रहा है के, आखिर उसे सजा किस बात की मिल रही है ! बस जिंदगी जैसे उसकी दुश्मन बन गयी है ! बस एकही सवाल उसे खाये जा रहा है के "मुझको सजा दी प्यार की
ऐसा क्या गुनाह किया" ! जिस अंदाज से इस्माईलने ने इस गीत को संगीतबद्ध किया है और के के ने गाया है , यह गीत दिल को छुए बिना रह नही सकता ! सुनने वाला इन्सान अगर थोडा बहोतभी संवेदनशील है, तो वह एकबार ही सही, लेकिन किरदार के दर्द को महसूस तो जरूर करेगा ! चलिये गीत के अंतिम अंतरे को देखते है
जहा उसने अब तय कर लिया है के अब वह सवाल सीधा खुदा से पुछेगा , लेकिन क्या सवाल पूछेगा? वो आईये जानते है
अगर मिले खुदा तो
पूछूंगा खुदाया
जिस्म मुझे देके मिट्टी का
शीशे सा दिल क्यों बनाया
और उस पे दिया फितरत
के वो करता है मोहब्बत
वाह रे वाह तेरी कुदरत
वाह रे वाह तेरी कुदरत
उस पे दे दिया किस्मत
कभी है मिलन कभी फुरक़त
कभी है मिलन कभी फुरक़त
क्या यही है वो मोहब्बत
वाह रे वाह तेरी कुदरत
सिसक-सिसक के इस दिल से
आह निकलती रही है
मुझको सजा दी प्यार की
ऐसा क्या गुनाह किया
सवाल को समझीये , वह पुछ रहा है के एक इतना मजबूत शरीर देकर कमजोर दिल क्यू दिया ? और फिर मुहोब्बत नामक भावना को क्यू दिल मे पनपने दिया , उपरसे किस्मत नामक अंजान चीज से प्यार का सफल या असफल होने का नाता क्यू जोड दिया !याने के ऐसी स्थिती क्यो बनाई , जहा प्यार का असफल होना इन्सान को तो काफी दर्द देता है लेकिन प्यार का सफल या असफल होना किस्मत पे निर्भर है !
सवाल तो लाजमी है साहब ! और जवाब ? वह तो वही देगा जिसके ऐसी स्थितिया बनायी है ! तो कुछ सवालोंको ऐसीही छोडकर हम आपकी इजाजत लेते है , मिलते है अगले हप्ते , क्या पता कुछ और सवाल जनहित मे जारी होने के इंतजार मे हो ?
- रणधीर पटवर्धन
परदेस से याने के अलग मुल्योंके देस से एक संगीतकार और गायक भारत मे संगीत सिखने गुरु के घर रहता है , उसके बेटी और वह प्यार कर बैठते है, गुरुदक्षिणा के ऐवज मे उसे प्यार की कुर्बानी देनी पडती है,गुरु की बेटी कही और बिहाई जाती है , शादीके बाद उसका पती उसे पिया से मिलाने की ठान लेता है , अंत मे संस्कार जीतते है, प्रेम हार जाता है !
अब तक बताई गई कहानी है 1999 मे प्रदर्शित और संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्म हम दिल दे चुके सनम की !यह फिल्म नसिरुद्दीन शाह , अनिल कपूर और पद्मिनी कोल्हापुरे द्वारा अभिनीत फिल्म "वो सात दिन " से काफी प्रभावीत है और वो सात दिन प्रभावीत है काफी सारे दक्षिण भारतीय फिल्मोसे ! हम दिल दे चुके सनम के संगीतकार है इस्माईल दरबार , गीतकार है मेहबुब और जिस गाने का आज जिक्र होगा उसे गाया है गायक "के के" ने !
यह गाणं फिल्म के दौरान उस वक्त सुनाई देता है जब गुरुदक्षिणा के ऐवज मे अपने प्यार की कुर्बानी दे कर फिल्म का नायक गुरु का घर छोड अपने देस वापिस जा रहा है , उसकी प्रेमिका घर के छत से देखते हुये भी, न चाहते हुये भी उसे जाने दे रही है ! गाना अपने मुखडे तक एक शेर के बाद पहूचता है , शेर कुछ् ऐसा है
बेजान दिल को तेरे
इश्क ने जिंदा किया
फिर तेरे इश्क ने ही
इस दिल को तबाह किया
मतलब बस इश्क ही बनाता है और इश्क ही तबाह कर देता है ! चलिये मुखडे की तरफ बढते है !
तड़प तड़प के
इस दिल से
आह निकलती रही
मुझको सजा दी प्यार की
ऐसा क्या गुनाह किया
तो लुट गए
हाँ लुट गए
तो लुट गए
हम तेरी मोहब्बत में
ठीक ध्यान दिजीयेगा नायक पुछ् रहा है, के भई प्यार ही तो किया था , ऐसा क्या गुनाह किया ? के लुट गये यांनी तबाह और बरबाद हो गये ! इसका मतलब, वह इस बात से अंजान है के हालाकी प्यार करना जुर्म नही है मगर " किससे प्यार हुआ है, किंस हालात मे प्यार किया है ? प्रेमियोंकी पार्श्वभूमी क्या है ? जैसे सवालो के जवाब प्यार को गुनाह बना देते है ! और गुनाह की सजा तो भुगतनी पडती है ! सारी अमर प्रेम कहानिया इस बात की गवाह है ! खैर चलिये अंतरे की तरफ बढते है
अजब है इश्क यारा
पल दो पल की खुशियाँ
गम के खजाने मिलते हैं
मिलती है तन्हाईयाँ
कभी आंसूं कभी आहें
कभी शिकवे कभी नालें
तेरा चेहरा नज़र आये
तेरा चेहरा नज़र आये
मुझे दिन के उजालों में
तेरी यादें तड़पाएं
तेरी यादें तड़पाएं
रातों के अंधेरों में
तेरा चेहरा नज़र आये
मचल-मचल के इस दिल से
आह निकलती रही
मुझको सजा दी प्यार की
ऐसा क्या गुनाह किया.
अब दुविधा देखिये इस बंदे की , वह असफल प्रेम की आग मे झुलस रहा है , उसका जीना किसी सजा से कम नही है ! और तो और, उसे ये समजमे नही आ रहा है के, आखिर उसे सजा किस बात की मिल रही है ! बस जिंदगी जैसे उसकी दुश्मन बन गयी है ! बस एकही सवाल उसे खाये जा रहा है के "मुझको सजा दी प्यार की
ऐसा क्या गुनाह किया" ! जिस अंदाज से इस्माईलने ने इस गीत को संगीतबद्ध किया है और के के ने गाया है , यह गीत दिल को छुए बिना रह नही सकता ! सुनने वाला इन्सान अगर थोडा बहोतभी संवेदनशील है, तो वह एकबार ही सही, लेकिन किरदार के दर्द को महसूस तो जरूर करेगा ! चलिये गीत के अंतिम अंतरे को देखते है
जहा उसने अब तय कर लिया है के अब वह सवाल सीधा खुदा से पुछेगा , लेकिन क्या सवाल पूछेगा? वो आईये जानते है
अगर मिले खुदा तो
पूछूंगा खुदाया
जिस्म मुझे देके मिट्टी का
शीशे सा दिल क्यों बनाया
और उस पे दिया फितरत
के वो करता है मोहब्बत
वाह रे वाह तेरी कुदरत
वाह रे वाह तेरी कुदरत
उस पे दे दिया किस्मत
कभी है मिलन कभी फुरक़त
कभी है मिलन कभी फुरक़त
क्या यही है वो मोहब्बत
वाह रे वाह तेरी कुदरत
सिसक-सिसक के इस दिल से
आह निकलती रही है
मुझको सजा दी प्यार की
ऐसा क्या गुनाह किया
सवाल को समझीये , वह पुछ रहा है के एक इतना मजबूत शरीर देकर कमजोर दिल क्यू दिया ? और फिर मुहोब्बत नामक भावना को क्यू दिल मे पनपने दिया , उपरसे किस्मत नामक अंजान चीज से प्यार का सफल या असफल होने का नाता क्यू जोड दिया !याने के ऐसी स्थिती क्यो बनाई , जहा प्यार का असफल होना इन्सान को तो काफी दर्द देता है लेकिन प्यार का सफल या असफल होना किस्मत पे निर्भर है !
सवाल तो लाजमी है साहब ! और जवाब ? वह तो वही देगा जिसके ऐसी स्थितिया बनायी है ! तो कुछ सवालोंको ऐसीही छोडकर हम आपकी इजाजत लेते है , मिलते है अगले हप्ते , क्या पता कुछ और सवाल जनहित मे जारी होने के इंतजार मे हो ?
- रणधीर पटवर्धन