Saturday, 20 June 2015

जनहित मे जारी - ५

   जनहित मे जारी  - 5
       शांताराम वणकुद्रे यानी व्‍ही शांताराम की फिल्‍म 'दो आंखें बारह हाथ' सन 1957 में रिलीज़ हुई थी ,इस फिल्‍म में कहानी एक युवा प्रगतिशील और सुधारवादी विचारों वाले जेलर   आदिनाथ की है, जो क़त्‍ल की सज़ा भुगत रहे पांच खूंखार कै़दियों को एक पुराने जर्जर फार्म-हाउस में ले जाकर सुधारने की अनुमति ले लेता है । और तब शुरू होता है उन्‍हें सुधारने की कोशिशों का   आशा -निराशा भरा दौर ।जेलर आदिनाथ अपने क़ैदियों को इसी ताक़त के सहारे सुधारता है, उनके भीतर की नैतिकता को जगाता है । यही नैतिकता उन्‍हें फरार नहीं होने देती । इसी नैतिक बल के सहारे वो कड़ी मेहनत करके शानदार फसल हासिल करते हैं ।  केहते है के मशहूर पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने 'दो आंखें बारह हाथ' से ही प्रेरित होकर दिल्‍ली की तिहाड़ जेल में क़ैदियों के रिफॉर्म का कार्यक्रम शुरू किया था और सफलता हासिल की थी
जिस गानेका आज जिक्र होगा उसे लिखा है भरत व्यासजी ने, संगीतबध्य किया है वसंत देसाई ने और गाया है लताजी ने ! बेहतरीन कंपोजीशन । इसके रिदम साईड पर ध्‍यान दीजिए । इस गाने को सुना है के पाकिस्तान मे " राष्ट्र गान " का दर्जा हासिल है ! पता नही, लेकिन जरूरी के वह देश इस गानेको "दिलसे" सुने भी ! खैर इस गानेके रिदम और कोरस पर ध्यान दिजीयेगा, काफी बेहतरीन है  !
 गाने की सिच्युएशन कुछ् ऐसी है के जेलर आदित्यनाथ मरने की कगार पे है और वह ये गाना गाने के लिये कहता है ताकी उसका भी दम हसते हुये निकले और साथ ही सबको जाते हुये भी संदेश मिले ! चलिये गाने की तरफ बढते है ! मुखडा कुछ ऐसा है !
 ऐ मालिक तेरे बंदे हम, ऐसे हो हमारे करम
नेकी पर चले और बदी से टले, ताकी हसते हुये निकले दम
 " मालिक " के बंदे कहा गया है इन्सान को और मालिक कौन है हम सब जानते है , और कहा गया है के जीनेका तरीका ऐसा हो के "हसते हुये निकले दम" ! और ये तभी होगा जब हम बदी याने की बुराई से बचे और नेक काम करे ! बात सही है तो फिर कठनाई क्या है ? अगला अंतरा इसके बारेमे बताता है 
ये अंधेरा घना छा रहा, तेरा इन्सान घबरा रहा
हो रहा बेख़बर, कुछ ना आता नज़र, सुख का सूरज छुपा जा रहा
है तेरी रोशनी में जो दम, तो अमावस को कर दे पूनम
इन्सान अंधरे मे है और इसलिये उसे नजर नही आ रहा , ध्यान दिजीये  सही और गलत के बारेमे जो अज्ञान है उसे यहा अंधेरा कहा गया है और  अब बस मालिक  ही है जो इस अमावस यानेकी अंधेरे को पूनम याने उजाले  मे परिवर्तीत कर देगा ! अगले अंतरे मे फिर एक बार समस्या और समाधान के बारे मे जिक्र है 
बड़ा कमजोर है आदमी, अभी लाखों हैं इस में कमी
पर तू जो खड़ा, है दयालू बड़ा, तेरी क्रिपा से धरती थमी
दिया तूने हमें जब जनम, तू ही झेलेगा हम सब के ग़म 
आदमी कमीयो और कमजोरियो से  भरपूर है तो  अपने आप से सुधर तो सकता नही तो अब बस मालिक की  कृपा ही अंतिम समाधान है और क्युके उसी ने हमे निर्मित किया है तो ये जिम्मेदारी उसीकी है ! जो दर्द देगा उसिकोही तो दवा देनी पडेगी ! अंतिम  अंतरे मे मालिक की कृपा किस तरह से होनी चाहिये उसके बारे जिक्र है ! ध्यान दिजीयेगा  

जब जुल्मों का हो सामना, तब तू ही हमें थामना
वो बुराई करे, हम भलाई भरे, नहीं बदले की हो कामना
बढ़ उठे प्यार का हर कदम और मीटे बैर का ये भरम
  मालिक से उम्मीद की गयी है के वह हमे जुल्मो का सामना करनेकी हिम्मत दे और हमारे मन से बदले की भावना को निकाल दे , यहा एक एक और पंगती भी है "वो बुराई करे, हम भलाई भरे"  इस पंक्तीमे हम याने इन्सान , हिंम्मत तो मालिक को देनी है , तो फिर "वो " कौन है जो बुराई करता है ?  
    जनाब ये वो "वो " है जो कहा जाता है के इन्सान  मे मौजूद है और उसे बुरे कर्म करवाता है ! तो असल मे ये जंग खुदसे है , अपने भीतर छिपे बुराई से है , बुरे कर्मे करनेकी चाह से है !  अगर हर इन्सान अपने भीतर की इस बुराई को नियंत्रित कर सके तो ये दुनिया और भी हसीन हो जायेगी ! हमारे मन मे अगर ये  श्रद्धा और भयं हो  के  मालिक सब देख रहा है और  तो भीतर की बुराई को जितना और अच्छायियो को   उभारना आसान हो जायेगा !
  कहा जाता है के  इन्सान के  मानस में नैतिकता की गहरी पैठ है । वही हमारे बर्ताव पर 'वॉचफुल आय' रखती है । हमें भटकने से बचाती है । अगर हमसे कोई ग़लत क़दम उठ जाता है तो हम अपराध-बोध के तले दब जाते हैं । तो बस यही उम्मिद है के उस  " नैतिकता" के निकष सही हो ! उसकी 'वॉचफुल आय' के बारेमे हम हमेशा अवगत हो ! और वह हम सबको बेहतर इन्सान बनाये और हमारा भी  "हसते हुये निकले दम" !  भई इसलिये हमने इस विचार को जनहित मे जारी किया है , तो मिलते है अगले हप्ते 
रणधीर पटवर्धन 

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